बच्चों की खामोशी के पीछे की आवाज़ | Parents ke liye Emotional Story
शीर्षक: बच्चों की खामोशी के पीछे की आवाज़ शहर की एक शांत कॉलोनी में वर्मा परिवार रहता था। बाहर से देखने पर यह परिवार बिल्कुल सामान्य लगता था, लेकिन उनके घर के भीतर एक अनकही खामोशी धीरे-धीरे जगह बना रही थी। यह खामोशी किसी झगड़े की नहीं थी, बल्कि उस दूरी की थी जो समय के साथ माता-पिता और बच्चों के बीच आ जाती है। सुरेश वर्मा एक निजी कंपनी में सीनियर पद पर कार्यरत थे। जिम्मेदारियां बहुत थीं और काम का दबाव भी। उनका मानना था कि परिवार की खुशी की सबसे बड़ी कुंजी आर्थिक सुरक्षा होती है। सुबह जल्दी निकलना और रात को देर से लौटना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। उनकी पत्नी अनीता एक समझदार और संवेदनशील महिला थीं, जो घर और बच्चों की हर ज़रूरत का ध्यान रखती थीं। उनका बेटा निखिल चौदह साल का था। पहले वह बहुत चंचल और बातूनी बच्चा था। स्कूल से लौटकर पूरे दिन की बातें सुनाता, सवाल पूछता और अपने सपनों के बारे में खुलकर बात करता। लेकिन पिछले एक साल से उसमें धीरे-धीरे बदलाव आने लगा था। अब निखिल ज़्यादातर समय अपने कमरे में रहता। न ज्यादा हंसता, न खुलकर बात करता। मोबाइल या किताबों में खुद को व्यस्त दिखाने लगा था...